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Saturday, 7 April 2018

कांग्रेस की आर्थिक नीति का विरोध करते-करते बीजेपी बनी उसी में चैम्पियन

विडंबना देखिए कि 2014 के लोकसभा चुनावों में प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने मनमोहन सिंह की कांग्रेस सरकार को आर्थिक नीतियों पर जमकर कोसा. प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने विकल्प के तौर पर कांग्रेस से उलट आर्थिक नीति की पेशकश की और सत्ता पर काबिज हुई. विडंबना यह कि 1980 में बनी इस पार्टी के पास कोई स्पष्ट आर्थिक नीति नहीं थी और अब लगभग चार साल तक सत्ता पर काबिज रहने के बाद विकल्प देना तो दूर कहा जा सकता है कि दोनों भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी की आर्थिक नीति में कोई अंतर नहीं है.

भारतीय जनता पार्टी की 1980 में स्थापना के वक्त पार्टी की आर्थिक नीति पूर्व की जनसंघ की तरह रही जहां राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और अन्य संबद्ध संगठनों की नीतियों को अपनाया गया. इस दौरान पार्टी ने स्वदेशी का नारा बुलंद करते हुए घरेलू उत्पादन पर जोर दिया और निर्यात में एक संरक्षणवादी नीति का पक्ष लिया. इसके साथ ही पार्टी ने कांग्रेस की उस औद्योगिक नीति का विरोध किया जिसके केन्द्र में सरकारी कंपनियों को रखा गया. लेकिन 1996 के चुनावों के दौरान पार्टी ने अपना रुख पूरी तरह बदला और संरक्षणवाद की जगह वैश्विकरण पर जोर देना शुरू कर दिया.

पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र में प्राथमिक क्षेत्रों में बड़े विदेशी निवेश की बात कही. फिर 1998 में सत्ता पर काबिज होते ही पार्टी ने वैश्विकरण के पक्ष में अपनी नीतियों को और पुख्ता कर लिया. इसके चलते भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली पहली एनडीए सरकार के कार्यकाल के दौरान बड़ी संख्या में विदेशी कंपनियों का भारत में आगमन हुआ. खास बात यह है कि जहां आरएसएस और अन्य संबद्ध संगठन (स्वदेशी जागरण मंच) इन नीतियों के विरोध में रहे, भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद इनका विरोध शांत हो गया.

इसके बाद 2004 से लेकर 2014 तक एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में बैठी. इस दौरान एक बार फिर पार्टी ने कांग्रेस की आर्थिक नीतियों का विरोध शुरू किया. बात देश में एक कर व्यवस्था लागू करने की हो तो पार्टी ने कांग्रेस के मसौदे को पूरी तरह नकार दिया. या फिर कांग्रेस सरकार द्वारा इनकम टैक्स में इजाफे की पहले हो तो इनकम टैक्स की व्यवस्था को पूरी तरह से खत्म करने की दलील दी गई. लेकिन 2014 में जब पार्टी सत्ता में वापसी करती है तो उसी जीएसटी को सबसे बड़े सुधार के तौर पर लागू किया गया. वहीं बीते चार साल के कार्यकाल के दौरान इनकम टैक्स को खत्म करने की दलील तो दूर सरकार की कमाई बढ़ाने के लिए लगातार टैक्स दायरे को बढ़ाने का काम किया गया. लिहाजा, यह कहा जाए कि सत्ता में बैठी कांग्रेस और बीजेपी की आर्थिक नीति में कोई अंतर नहीं है तो इसके पक्ष में मजबूत तर्क सरकार ने कार्यकाल के दौरान पेश किया है.

Source:-Aajtak

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